Wednesday, May 13, 2009

सूरत में आई बाढ़ के वो पांच दिन


तारीख सात अगस्त २००६, समय दिन के करीब दो बजे।
रोजाना की भांति अपने अहमदाबाद ऑफिस में बैठकर मैं गुजरात की गतिविधियों पर नजर रखे हुए था।
सूरत से हमारे स्थानीय संवाददाता रौनक पटेल का फोन आया। आवाज में थोड़ी
व्यग्रता थी, थोड़ी उत्तेजना भी। रौनक ने कहा, सर सूरत में हालात खराब
होने जा रहे हैं। ताप्ती नदी, जिसे सूरत में लोग तापी के नाम से ही
ज्यादा पुकारते हैं, उसका जल स्तर लगातार बढ़ रहा था। वजह ये थी कि
ताप्ती नदी के उपर नजदीक के उकाई में जो डैम बना हुआ था, उसमें पानी
डेंजर लेवल को क्रॉस कर चुका था। मानसून का सीजन था, तीन सौ पैंतालीस फीट
उंचे डैम के सौ वर्ग किलोमीटर के कैचमेंट एरिया में, जो महाराष्ट्र से
लेकर मध्यप्रदेश तक फैला हुआ था, लगातार बारिश हो रही थी और वो पानी सूरत
के लिए खतरे की घंटी बन रहा था। सिंचाई विभाग के अधिकारियों और इजीनियरों
की भूमिका भी इस दौरान लापरवाह रही थी, जो मानसून के पहले डैम का पानी कम
करने की जगह उसे भरे हुए थे, ताकि साल भर तक बिजली हासिल होती रहे बांध
आधारित पनबिजली परियोजना के जरिये। और ऐसे में जब बारिश जोरदार हुई
कैचमेंट एरिया में, तो बांध को बचाने के लिए पानी छोड़ने के अलावा कोई
विकल्प नहीं बचा। ताप्ती नदी में छह अगस्त को तीन लाख क्यूसेक पानी छोड़ा
गया था और सात अगस्त की दोपहर जब रौनक का फोन आया, बांध से नदी में छोड़े
जा रहे पानी की मात्रा बढ़कर पांच लाख क्यूसेक हो चुकी थी। दरअसल ताप्ती
नदी की कैरिंग कैपेसिटी सिर्फ चार लाख क्यूसेक की थी, ऐसे में उससे
ज्यादा पानी का आना शहर में बाढ़ पैदा करने में सक्षम था। रौनक ने कहा कि
बांध से नदी में छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा और बढ़ेगी ही क्योंकि
कैचमेंट एरिया में बारह लाख क्यूसेक का इनफ्लो है और डैम से पानी उसी
रफ्तार से छोड़ना पड़ेगा, क्योंकि डैम तो लबालब भऱा हुआ है। और पानी की
इतनी बड़ी मात्रा सूरत में हाहाकार ही पैदा करेगी।
रौनक से बातचीत के बाद थोड़ी देर तक सोचता रहा कि सूरत के लिए निकलूं कि
नहीं निकलूं। दरअसल अहमदाबाद छोड़ते समय हमेशा ये चिंता रहती है कि अगर
पीछे कुछ बड़ा हो गया तो। खैर, सर को झटका दिया, सूरत जाने के बारे में
इरादा पक्का कर लिया और फिर मुख्यालय में वरिष्ठों को फोन किया, उन्होंने
भी अपनी सहमति तत्काल दे दी। दरअसल सूरत की तरफ तेजी से भागना ऐसी
परिस्थित में जरूरी था, क्योंकि जितनी देर होती, शहर में पानी भरता जाता
और फिर शहर के अंदर प्रवेश भी संभव नहीं हो पाता। ऐसे में तीन बजते-बजते
मैंने अहमदाबाद शहर छोड़ दिया, कैमरामैन आर एम पांडे के साथ।

करीब दो सौ साठ किलोमीटर लंबे सफर के लिए निकली स्कॉर्पियो लगातार दौड़ती
रही और इधर लगातार बजते रहे मेरे दोनों फोन। एक तरफ रौनक तो दूसरी तरफ
नोएडा ऑफिस। अपडेट का सिलसिला चलता रहा। वड़ोदरा तक तो कुछ असर नहीं
दिखा, लेकिन जब भरूच से आगे बढ़ा, तो असर तुरंत दिखना शुरू हो गया। भरूच
के ठीक बाहर नर्मदा नदी पर जो पुल है, उसके नीचे से पानी का सैलाब बह रहा
था। किनारे चौड़े हो गये थे, नर्मदा बांध भी ओवरफ्लो हो रहा था, ऐसे में
नदी के अंदर पानी का प्रवाह खतरे के निशान को पार कर गया था। सात बजे के
करीब पुल पर रूककर हालात को देखा तो अपना कलेजा भी मुंह को आ गया।


खैर आगे बढ़ा तो शुरू हुआ अंकलेश्वर से ही ट्रकों का जाम। किम चौकड़ी तक
पहुंचा, तो सड़क के उपर से पानी का प्रवाह शुरू हो चुका था। दुस्साहस का
परिचय देते हुए ड्राइवर ने एक तरफ जहां पानी की धार का सामना किया, तो
दूसरी तरफ आड़े-तिरछे ट्रकों के अंतहीन सिलसिले के बीच से स्कॉर्पियो को
गुजार लेने की अपनी बाजीगरी का प्रदर्शन। एक – एक मिनट भारी पड़ रहा था,
सोच ये कि जितनी देर होगी, सूरत तक पहुंचना उतना ही मुश्किल। आखिर-आखिर
तक तो गाड़ी रौंग साइड में ही डाल देनी पड़ी और फिर शहर के पहले नहीं,
दूसरे नहीं, बल्कि तीसरे रास्ते से अंदर घुसने में मिली कामयाबी।


शहर के अंदर घुसते-घुसते रात के दस बज चुके थे। लेकिन हालात की भयावहता
का अंदाजा लगाने में देरी नहीं हुई। पता चला कि शहर के सबसे पॉश इलाके
अठवा लाइंस, जिधर सर्किट हाउस से लेकर सभी बड़े अधिकारियों के निवास और
कार्यालय हैं, वहां पानी भर रहा है। रास्ते में सेना की गाड़ियां मिली,
बचाव कार्य में लगे हुए थे सेना के जवान। उनके कुछ विजुअल्स रिकॉर्ड किये
और फिर अठवा लाइंस जाने का इरादा त्याग कर सूरत रेलवे स्टेशन के करीब
रिंग रोड़ पर बने होटल पार्क इन में चेक इन किया। सामान वगैरह रखा, रौनक
को बुलाया, तब तक ओबी वैन भी मुंबई के रास्ते सूरत पहुंच गई। अगली सुबह
भयानक होने वाली है, ताप्ती नदी में बारह लाख क्यूसेक पानी छूटना है और
अगले कुछ दिन भाग दौड़ तेज रहने वाली है, ये सोचकर रात एक बजे के करीब जो
कुछ मिला फटाफट खाया और फिर होटल में अपनी पूरी टीम के साथ सो गया। लेकिन
शहर के बारे में सोचकर जल्दी नींद भी नहीं आई। रही-सही कसर बिजली ने पूरी
कर दी। एहतियात के तौर पर शहर के ज्यादातर हिस्सों में रात में बिजली काट
दी गई, क्योंकि इलेक्ट्रोक्यूशन का खतरा बाढ़ग्रस्त सूरत में बढ़ गया था।

८.०८.२००६
आठ अगस्त की सुबह हम सब जल्दी उठे। फटाफट चाय, कुछ बिस्कुट खाकर हम लोग
निकल पड़े घुड़दौड़ रोड की तरफ। शहर के पॉश इलाकों में से एक घुड़दौड़
रोड पर पानी दो से तीन फीट तक भर चुका था, प्रवाह तेज था, इसलिए पानी और
भरेगा, तस्वीर साफ थी। पानी में डभाडभ करते हुए, अपने को धार में गिरने
से बचाते हुए लोगों से बातचीत की। घरों में बिजली जा चुकी थी, अखबार नहीं
आया था, शाक-सब्जी तो दूर की बात। हालांकि इन सबके बीच कुछ सही सलामत था,
तो वो रसोई गैस की सप्लाई। सूरत देश के उन कुछ शहरों में से एक है, जहां
काफी पहले से पाइप्ड गैस का रिवाज रहा है।

घुड़दौड़ रोड से आगे जाने का इरादा किया, लेकिन पानी की धार और गहराई
दोनों ने हिम्मत तोड़ दी। पता नहीं कब सीवर में पांव पड़ जाए या फिर पानी
गर्दन से उपर पहुंच जाए। करेंट तो तेज था ही, कैमरा और माइक किसी भी समय
पानी के अंदर गर्क हो सकते थे। इसी दरमियान ये पता चला कि शहर के चौक
इलाके में सेना ने बचाव कार्य शुरू किया है। वहां पर पानी डेढ़ मंजिल तक
भर चुका था। लोग या तो जान बचाकर नजदीक के इलाके में जा चुके थे या फिर
जो निकल नहीं पाये थे वो घरों की सबसे उपरी मंजिल पर। ऐसे में बीमार
लोगों को बाहर निकालना और साथ ही फंसे हुए लोगों तक राहत सामग्री
पहुंचाना सेना की पहली प्राथमिकता थी। हम भी इसके गवाह बनने शुरू हुए।

सेना के जवानों के साथ रस्सी पकड़कर उस प्वाइंट तक गये, जहां से नावें चल
रही थीं। इन्हीं में से एक पर बैठकर हम लोग बाढ़ की रिपोर्टिंग के लिए
निकल पड़े। उसी नाव पर थी पानी की बोतलें, दूध और बिस्कुट के पैकेट। सड़क
जो कि पानी के कारण नहर का रूप ले चुकी थी, उसके दोनों किनारों पर जो घर
मौजूद थे, उन पर हाथ फैलाये खड़े थे लोग। एक तरफ राहत सामग्री फेंकी
जाती, तो दूसरी तरफ से हाहाकार। इस चक्कर में अगर जल्दी से किसी जवान ने
अपना शरीर एक तरफ से दूसरे तरफ घुमाया, तो नाव डगमगाने लगती थी।

लेकिन ये तो शुरूआत थी। जैसे-जैसे आगे बढ़ते गये, वैसे-वैसे खतरा बढ़ता
गया। बीच में नाव को मोड़ना भी संभव नहीं था। खैर जैसे ही चौक इलाके के
मुख्य चौराहे गांधी चौक पर हम पहुंचे, जिसका पता बिजली के खंभों के आखिरी
हिस्सों के बाहर दिखने से ही लग रहा था, सांसे धड़क गईं। कारण ये कि
अचानक नाव पूरी तरह डगमगा गई। लगा ये कि नाव अब पलटी तो अब पलटी। दरअसल
नदी का पानी अपने किनारों को तोड़ता हुआ शहर के इस हिस्से की तरफ मुड़
चुका था और वही धार सीधे नाव पर पड़ी थी। दो-तीन सेकेंड तो याद नहीं रहे,
सेना के जवानों की हिम्मत भी टूटते –टूटते ही बची थी। पता चला कि जो जवान
नाव की मोटर संभाल रहा था, उसका अनुभव भी इस मामले में कुछ खास नहीं था।
खैर किसी तरह नाव स्थिर हुई, आगे बढ़ी और सबने अपने माथे से पसीना साफ
किया। गांधी चौक पर गरीब रिक्शा वाले पतली प्लास्टिक शीटों के बीच अपने
को छिपाये हुए राहत का इंतजार कर रहे थे, यहां भी राहत सामग्री बांटते
समय हलचल की वजह से नाव तो डगमगाती ही रही। राम-राम जपते एक बार फिर से
हमारी वापसी यात्रा शुरू हुई। इस दौरान भी नदी की शहर की तरफ मुड़ी धार
से साबका पड़ा। लेकिन पिछली बार का अनुभव काम आया और नाव आगे बढ़ा ली गई।

किनारे पर आने के बाद शहर के दूसरे हिस्सों का रुख किया। इस दौरान पाया
कि पानी शहर के उन हिस्सों में भी घुसना शुरू हो गया है, जहां कल तक पानी
नहीं था। तब तक नदी में बारह लाख क्यूसेक पानी आना शुरू हो गया था।
अंदाजा लग गया कि रात तक शहर के ज्यादातर हिस्सों का बंटाधार हो जाएगा।

लाइव और जगह-जगह से रिपोर्टिंग करने के बाद शाम को होटल लौटा। जेनसेट के
सहारे होटल में बिजली मिल रही थी, लेकिन एसी नहीं। सोचा कि थोड़ा आराम कर
फिर से शहर में निकलूं। रात के हालात को देखूं। अगले दिन रक्षाबंधन का
त्यौहार भी था। भाई-बहन के इस पवित्र त्यौहार को इस बार सूरत शहर में
ज्यादातर लोग नहीं मना पाएंगे, क्योंकि बस और ट्रेन की गतिविधियों पर भी
असर पड़ना शुरू हो चुका था। इसी दरमियान नीचे से किसी ने सूचना दी कि
होटल के बाहर भी पानी आना शुरू हो गया है। लगा कि एक-डेढ़ फीट तक पानी
रहेगा, लेकिन ये भरोसा गलत साबित हुआ। रात बढ़ते-बढ़ते होटल के बाहर पानी
दो फीट तक जमा हो गया। यहां तक कि थोड़ी उंचाई पर मौजूद होटल की सीढ़ियां
तक पानी से भर गईं, किसी वक्त पानी अंदर घुस सकता था। इस बीच कोई
चिल्लाया कि बेसमेंट मे पानी घुस गया। होटल की बिजली का मेन स्विच और
जेनरेटर दोनों ही बेसमेंट के अंदर थे और ऐसे में बिजली की बलि तत्काल चढ़
गई।

इसी दरमियान सूरत के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर सुधीर सिन्हा से भी मुलाकात
हुई। उनके आधिकारिक आवास में भी पानी घुस चुका था, ऐसे में सिन्हा ने
हमारे होटल में शरण लेनी चाही, लेकिन यहां भी हालात बदतर थे, बिजली गायब
थी। दूसरा ठिकाना ढूंढने के लिए होटल के बाहर निकले, तो हमने लपक लिया।
इंटरव्यू के दौरान उन्होंने ये बताया कि पुलिस के लिए भी काम करना कितना
मुश्किल है, फोन तक तो चल नहीं रहे थे। सेना और वायुसेना दोनों की मदद
लेकर राहत सामग्री पहुंचाने की कोशिश की जा रही थी, लेकिन बाढ़ग्रस्त
लोगों की तादाद इतनी अधिक कि सब तक राहत पहुंचाना आसान नहीं।

सिन्हा के इंटरव्यू के बाद कमरे में जाने का फैसला किया। घुप्प अंधेरे के
बीच होटल प्रबंधन ने मोमबत्तियों के सहारे सीढ़ियों पर थोड़ी रौशनी पैदा
की थी। आम तौर पर सीढियों का इस्तेमाल कम ही होता है होटलों में, लिफ्ट
से लोग उपर की मंजिलों पर जाते हैं। जब बिजली गई, तो होटल वालों को हर
फ्लोर पर अटेंडेंट रखने पड़े, ताकि वो बता सकें कि आगे कैसे बढ़ें।
गिरते-पड़ते कमरे में पहुंचे, तो लगा कि मोमबत्ती की रौशनी में बैठकर
यहां करेंगे क्या। इसलिए फिर से बाहर निकलने की तैयारी कर ली। बाढ़ के
हिसाब से प्लास्टिक वाली जैकेट और लोवर भी डाल लिया। लोवर के नीचे हाफ
पैंट भी। यही तैयारी बाकियों ने भी की। हम नीचे पहुंचे तो साथ में था एक
छोटा सा बैग भी, जिसमें शूट टेप के अलावा साबुन, ब्रश और तौलिया रख लिया
था मैंने। रौनक से पूछा कि शहर में सबसे उंची जगह कौन है, जहां पर खुद के
अलावा ओबी वैन को भी शिफ्ट किया जा सके। उसने झट से नाम ले लिया स्टेशन
का, क्योंकि उसके परिवार के बड़े-बूढ़ों ने बताया था कि सबसे आखिर में
स्टेशन पर पानी चढ़ता है। बात सच निकली। हम लोग स्टेशन की तरफ भागे अपनी
गाड़ी में बैठकर, पीछे लिया ओबी वैन को। राहत की बात ये थी कि गाड़ियों
के साइलेंसर पानी से उपर रह पाए थे, इतनी ही गुंजाइश बची थी। रात ग्यारह
बजे के करीब जब रेलवे स्टेशन पहुंचे, तो खुद स्टेशन भी शरणार्थी शिविर ही
बन चुका था। प्लेटफार्म पर बड़े पैमाने पर शहर के लोगों ने जगह ले रखी
थी। खैर, अपनी गाड़ियों को हमने पार्सल यार्ड के उपर वाले हिस्ते तक
चढ़ाया और गाड़ी में ही रात गुजारने का इरादा किया, ताकि सुबह फिर से काम
पर लगा जाए। लेकिन नींद कहां आए, मच्छरों ने धावा जो बोल दिया था। गाड़ी
से नीचे उतरे, साथ में मौजूद तीन-चार चैनलों के पत्रकारों के साथ
प्लेटफार्म नंबर एक पर चहलकदमी शुरू की। अहमदाबाद – सूरत के बीच ट्रेनों
का परिचालन ठप होने ही जा रहा था, क्योंकि किम के पास पानी पटरियों को छू
रहा था।

हम लोगों ने सोचा कि रेलवे अधिकारियों से बातचीत कर प्रथम श्रेणी
प्रतिक्षालय खुलवा लिया जाए। साथ में मौजूद उपकरणों की सुरक्षा भी जरूरी
थी, शरीर तो टूट ही रहा था। लेकिन रेलवे तंत्र तो रेलवे तंत्र ही ठहरा।
असाधारण परिस्थिति का अहसास अधिकारियों को काहे हो, वो तो हमें रूल बुक
बता रहे थे। झल्लाकर मैंने सीपीआरओ वेस्टर्न रेलवे मुंबई को रात के एक
बजे फोन लगाया। बेचारे गहरी नींद में थे, हमारी मांग सुनकर तो उनकी
झल्लाहट और बढ़ गई। लेकिन कोई चारा था नहीं, ऐसे में ना नुकुर के बाद
उन्होने रेलवे के नेटवर्क पर वेटिंग रूम खुलवाने के लिए मैसेज देने का
आश्वासन दे दिया। करीब आधे घंटे बाद हमें कामयाबी मिली और कमरा खुल गया।
फिर क्या था, एक के उपर एक लोग फर्श पर ऐसे गिरे, मानो आगे उठने का कोई
इरादा नहीं हो। डेढ़ दिनों की थकावट असर दिखा रही थी। एक कमरे के अंदर
पंद्रह लोग फर्श पर बिखरे पड़े थे।

९.०८.२००६
सुबह के पांच बजे वापस कर्मपथ पर जाने की तैयारी शुरू हो गई।
वेटिंग रूम के बाथरूम में जाकर देखा, तो पानी का कोई पता नहीं। नित्य
कर्म तो करना ही था, ऐसे में बाहर से मिनरल वाटर की बोतलें खरीदकर काम
चलाया गया। मुंह धोकर स्टेशन के बाहर निकले, तो पाया कि रेलवे स्टेशन के
बाहर भी पानी आ गया था। हालात की भयावहता का अंदाजा नये सिरे से हो गया।
रेलवे स्टेशन के बाहर पानी का आना इस बात की तरफ इशारा कर रहा था कि शहर
के ज्यादातर हिस्सों में पानी भर चुका है। ब्रिटिश शासन काल के दौरान
तत्कालीन इंजीनियरों ने किसी भी शहर में उसी जगह पर रेलवे स्टेशन का
निर्माण किया था, जो शहर का सबसे उंचा हिस्सा था। देश के सभी पुराने
रेलवे स्टेशनों के बारे में ये बात सच है।

खैर, रेलवे स्टेशन पर घिरे लोगों की दुर्दशा को लाइव के दौरान सुबह छह
बजे से ही दर्शकों तक पहुंचाने की प्रक्रिया शुरू कर दी। रेलवे यातायात
भी तब तक ठप हो चुका था। बहनें भाइयों को राखी बांधने शहर के बाहर नहीं
जा सकती थीं और न ही बाहर से रेलवे स्टेशन तक पहुंच चुकी बहनें शहर के
अंदर अपने भाइयों तक पहुंच सकती थी। बाहर से आने वाले भाइयों का भी यही
हाल था। कई मार्मिक केस स्टडी हाथ लगे।

आसपास के इलाकों में जाने की इच्छा हुई, लेकिन पानी का तेज बहाव हमारे
होश उड़ा रहा था। तब तक पुलिस भी जगह-जगह नाके लगा चुकी थी, ताकि कोई
गलती से गहरे पानी में न घुस जाए। ज्यादातर अंडरपास भी बंद हो चुके थे।
पूरे दिन रेलवे स्टेशन के आसपास के इलाकों में जहां तक सीने तक पानी
मौजूद था, वहां तक गया, रिपोर्टिंग की। सीने से ज्यादा पानी होने पर आगे
बढ़ना संभव नहीं था। और कोई चारा था नहीं। यही करते-करते सुबह से शाम हो
गई, सोचा कि होटल की तरफ बढ़ा जाए। वहां भी हालत बुरे ही थे। राशन की कमी
होनी शुरू हो गई थी, जेनरेटर तो पहले ही बंद हो चुका था। ऐसे में हमारे
थ्री स्टार होटल के अंदर भी अला कार्टे खान-पान की सुविधा बंद हो चुकी
थी, मामूली सा बूफे लगा दिया था, जिसमें रोटी, दाल और एक दो सब्जियां
सीमित मात्रा में मुहैया थीं। होटल का स्टाफ भी पिछले तीन दिनों की भाग
दौ़ड़ से थक चुका था। यहां तक कि किसी को शेविंग की फुर्सत तक नहीं मिली
थी, कपड़े पर भला किसका ध्यान था। रात दस बजे तक जिसने खाना खा लिया, तो
खा लिया, बाकी वो भी बंद।

बिजली थी नहीं, ऐसे में दो मोमबत्तियों का कोटा लेकर उपर चढ़ा, तो
सीढ़ियों पर कही-कही मोमबत्ती जलती बची रह गई थी। कभी पांव लड़खड़ा जाते,
तो कभी हाथ टकरा जाते दीवाल से। कमरे में बिस्तर तक होटल स्टाफ ने ठीक
नहीं किया था, जो जहां छोड़कर गया था, वहीं पड़ा हुआ था। बाथरूम में पानी
तक नहीं था, पता चला कि जेनरेटर बंद होने के बाद होटल के ओवरहेड टैंक में
जितना पानी था, खर्च हो चुका है औऱ कमरों के अंदर पानी की सप्लाई बंद हो
चुकी है। थकान इतनी थी कि रिसेप्शन पर फोन करने की हिम्मत भी नहीं हुई और
कमरे का दरवाजा खोलकर हम सो गये, ताकि थोड़ी ताजी हवा तो मिले।

१०.०८.२००६
सुबह छह बजे उठकर फिर से शहर के हालात का जायजा लेने के लिए हम निकल
पडे़। यहां ये बता दूं कि बाथरूम में पानी तो आ नहीं रहा था, होटल के
स्टाफ से रिक्वेस्ट की, तो छत पर मौजूद होटल के स्विमिंग पूल से दो
बाल्टी पानी लाकर उन्होंने दे दिया। इसी के सहारे जैसे-तैसे अपने को ठीक
किया हमलोगों ने।

हम सबसे पहले रेलवे स्टेशन पर पहुंचे। अभी तक अहमदाबाद से सूरत आने वाली
रेल लाइन ठीक नहीं हो पाई थी। ट्रेनों का चलना बंद था। लेकिन मुंबई से
सूरत तक की रेल लाइन सही सलामत थी। ऐसे में सुबह-सुबह एक ट्रेन से कुछ
स्वयंसेवी संस्थाएं राशन और पानी का बड़ा स्टॉक लेकर मुंबई से सूरत रेलवे
स्टेशन पहुंची। सारी व्यवस्था इनकी खुद की थी। सामान के साथ वितरण के लिए
वोलंटियर तक। सूरत के बाढ़ पीड़ितों को राहत पहुंचाने में भागीदार बन
सकें, ये उद्देश्य लेकर ये पहुंचे थे सूरत। स्टेशन पर आ रही इस राहत
सामग्री को शहर के दूसरे हिस्सों में ले जाने के लिए पुलिस का एस्कोर्ट
भी मुहैया कराया गया। कई जगह ऐसे वाकये हुए, जिसमें भूखे-प्यासे लोगों ने
रास्ते में ही सामान को लूट लिया। लूट की बात चली तो ये भी ध्यान आया कि
शहर के कुछ इलाकों में चोरी की वारदातें भी हुई थीं रात के दौरान, कुछ
लोगों ने कारों के ऑडियो सिस्टम चुरा लिये थे, जिसे लेकर कई इलाकों में
अच्छा – खासा बवाल हुआ था। इसी दौरान स्थानीय और पर प्रांतीय लोगों के
बीच कुछ जगह झड़प भी हुई। स्थानीय लोगों का आरोप ये कि पर प्रांतीय इस
दौरान चोरी और लूट की वारदात को अंजाम दे रहे हैं। घबराए आप्रवासी श्रमिक
सूरत के रेलवे स्टेशन पर आ पहुंचे थे, उनकी भी व्यथा सुनी।

स्टेशन से रुख किया रिंग रोड पर बने टेक्सटाइल्स मार्केट फ्लाइ ओवर का।
आठ अगस्त की रात से ही फ्लाइओवर के दोनों हिस्से पानी से घिर चुके थे।
यानी जो इसके उपर रह गया, वो रह गया। ऐसे सैकड़ों लोग थे, जो अपनी
गाड़ियों को उंची जगह पर रखने के चक्कर में यहां आए, तो फिर निकल ही नहीं
पाए। इन्हीं में हमारे एक पत्रकार मित्र आशीष जोशी भी थे, जिन्हें दो
दिनों तक नित्य कर्म पुल पर ही करना पड़ा। खैर दस अगस्त की सुबह जब यहां
मैं पहुंचा, तो पुल खुद राहत शिविर में बदल चुका था। हजारों परिवारों ने
फ्लाईओवर पर ही दोनों लेन में प्लास्टिक शीट के सहारे झोपड़े डाल दिये
थे। इनके बीच से गाड़ियों को गुजारने की मामूली जगह बची थी।

मैं पुल पर ही था, तब तक नौ बजे के करीब सेना का एक दस्ता बोट को ट्रकों
पर लादकार आगे बढ़ता दिखा। बस हम पीछे-पीछे लग लिये। पता चला कि ये
काफिला कतारगाम इलाके में जा रहा है, जो शहर के सबसे अधिक बाढ़ग्रस्त
इलाकों में से एक था। कतारगाम में आखिरकार ट्रकों से बोट उतारी गईं और इन
पर लादा गया राहत का सामान। सामान बांटने के लिए सूरत नगर निगम के
अधिकारी भी आ गये थे। सुखद आश्चर्य ये हुआ कि ऐसी परिस्थिति में भी नगर
निगम के अधिकारियों में उत्साह खूब था, यहां तक कि ज्यादातर ने नीली शर्ट
पहन रखी थी, नगर निगम के अधिकारियों की यूनिफॉर्म है ये।

सेना के इंजीनियर कोर के मेजर जी एस कान्याल राहत और बचाव टुकड़ी की
अगुआई कर रहे थे। उनकी इजाजत लेकर अपने कैमरामैन के साथ बोट पर चढ़ा।
राहत सामग्री के बीच थोड़ी सी जगह अपने लिए बनाई। लाइफ जैकेट पहन नहीं
पाया, क्योंकि वो एक्सट्रा थे ही नहीं। भाग्य पर सब कुछ छोड़ दिया। हफ्ते
भर पहले ही यानी ३१ जुलाई को अहमदाबाद के एक गांव गणोल में बाढ़ आई थी और
कवरेज के दौरान फायर ब्रिगेड की बोट के सहारे अपने कैमरामैन पवन जायसवाल
के साथ आगे बढ़ रहा था। पानी के तेज प्रवाह में बोट उलट गई, तैरना नहीं
जानता था, लेकिन फायर ब्रिगेड के जांबाज जवानों की मदद से बच गया, वो भी
उस जगह जहां पानी १७ फीट गहरा था। करीब डेढ़ घंटे तक रस्सियों के सहारे
पानी के तेज प्रवाह के बीच हम बचे रहे, पानी के उपर टिके रहे। इसलिए इस
बार भी भाग्य पर ही सब कुछ छोड़ दिया।

खैर हमारी बोट आगे बढ़ी, तो बाढ़ का कहर आंखों के सामने आना शुरू हो गया।
रास्ते में जगह – जगह गाय और भैंस जैसे मवेशियों के शव फूलकर पानी में
तैर रहे थे। पानी बाढ़ के तीसरे दिन भी पंद्रह से बाइस फीट तक था।
जैसे-जैसे नदी के किनारे वाले इलाके में जा रहे थे, पानी का स्तर बढ़ता
जा रहा था।


कतारगाम इलाके में एक मंजिल से लेकर दो-दो मंजिल तक पानी में
डुबे हुए थे। जिनका घऱ एक मंजिला या दो मंजिला था, उन्होंने बगल के मकान
में शरण ले रखी थी। इनके बीच पानी की बोतलें या बिस्कुट-नमकीन के पैकेट
पहुंचाना भारी-भरकम चुनौती थी। किसी मकान के करीब नहीं जा सकते थे,
क्योंकि पता नहीं मकान के नजदीक कहीं उसकी बाउंड्री वाल नाव के नीचे न आ
जाए, या फिर कोई खंभा।

पानी का प्रवाह तब भी तेज था, ऐसे में नाव को
मकानों के बीचो-बीच सड़क पर खेना पड़ रहा था। और ऐसे में सेना के जवान
अपने मजबूत बाजुओं के सहारे दूसरी मंजिल से लेकर चौथी या फिर पांचवी
मंजिल तक पैकेट उछालकर फेंकने का काम कर रहे थे। इनमें से कई दफा एक
चौथाई सामान पानी में ही वापस गिर जाता था, लेकिन आप कुछ कर नहीं सकते
थे। जितना पहुंच जा रहा था, वही काफी था ऐसे हालात में।

कई जगह लोगों ने
राहत सामग्री बटोरने का अनूठा तरीका अख्तियार किया। लंबी रस्सी के सहारे
अपने घर की बाल्टी को नाव के उपर लटकाने की कोशिश की उपरी मंजिलों से और
इनमें सामान रख देने पर उपर खीच लिया।

इस दौरान एक और घटना हुई। जब हम किनारे से नाव शुरू कर रहे थे, तो एक
आदमी आया, जिसने ये बताया कि बाढ़ का शिकार हुए एक आदमी का शव किसी गली
के पास तैर रहा है। ऐसे में सेना के मेजर ने उसे नाव पर बिठा लिया। लेकिन
जब नाव करीब दो किलोमीटर अंदर गई, तो अचानक उसने नाव से छलांग मार दी और
गायब हो गया। पता ये चला कि बंदा अपने घर तक पहुंचना चाह रहा था और तैरने
की जगह उसने बोट की ज्वाय राइड ले ली। प्राकृतिक आपदा के बीच मानव
प्रकृति के एक और पहलू की झलक मिली।



करीब तीन घंटे में हम वापस पहुंचे। यहां से आगे चौक की तरफ बढ़ा। वो चौक
इलाका, जहां आठ तारीख को भी गया था और अब पानी थोड़ा कम होने पर राहत का
सिलसिला वहां भी सेना ने शुरू किया था। हालांकि सेना यहां नाव की जगह
भारी-भरकम टाट्रा ट्रकों का इस्तेमाल कर रही थी, जिनका इस्तेमाल सेना में
बड़े-बड़े टैंको को ढोने के लिए किया जाता है। इनके इंजन की ताकत का
अंदाजा आप लगा ही सकते हैं।

इनकी खासियत एक और थी, वो ये कि इनके
साइलेंसर नीचे की जगह उपर की तरफ थे, वैसे ही जैसे गांव की चक्कियों के
होते हैं। ऐसे में आठ फीट की गहराई तक इन ट्रकों के पानी में बंद होने की
कोई आशंका नहीं थी। जब चौक के अंदर इन ट्रकों ने पानी को फाड़ते हुए तेज
रफ्तार से जाना शुरू किया, तो पता चला कि इनके प्रेशर से आसपास की
दुकानों के शटर फटाफट टूट रहे है। ट्रकों के ड्राइवरों का ध्यान इस तरफ
दिलाया गया, तो रफ्तार थोड़ी धीमी हुई।

खैर अंदर के इलाके में जाकर राहत
सामग्री को बांटने का सिलसिला शुरू हुआ। अब भी गलियों में छह-छह, आठ-आठ
फीट पानी था, लेकिन लोग टायरों या रस्सियों के सहारे घरों से बाहर निकल
रहे थे। इस दौरान गलियों में पानी के उपर तैरते कूड़े-कचरे और इनके बीच से आवश्यक
सामानों को पाने के लिए तैराकी करते साहसी युवकों को भी देखा। एक सज्जन
तो इन सबके बीच ऐसे भी नजर आए, जिनके लिए बाढ़ का ये मौका तीन-चार साल के
अपने बच्चे को प्लास्टिक की खिलौनानुमा बोट में तैराने का रहा। हमारे
फौजियों ने आगाह किया कि बच्चे को टाट्रा ट्रक से दूर ले जाओ, नहीं तो
झटके में बच्चे का नुकसान हो जाएगा।

यहां से बाहर निकला तो खबर मिली कि राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी
इस इलाके का दौरा करने के लिए आ रहे हैं। टाट्रा के सहारे ही चौक तक
पहुंचने वाले मोदी बाद में बोट पर बैठकर गलियों के अंदर गए। हालांकि उनका
ये मुआयना सुरक्षा एजेंसियों और फौज के जवानों के लिए खासा चुनौतीपूर्ण
रहा। पता नहीं कब नाव डोल जाए। अच्छी बात ये रही कि मोदी के साथ जाने
वालों की तादाद कम थी और फौज के तैराकों के लिए इनको मैनेज करना आसान
रहा। इस बीच प्रधानमंत्री भी सूरत का दौरा करने पहुंचे थे, लेकिन सूरत
में उनका जमीनी दौरा संभव नहीं हो पाया और हवाई सर्वेक्षण कर ही वो चले
गये।

इन सियासी दौरों के बीच आम लोगों की शिकायतें बढ़ रही थी, बाढ़ का पानी
कम होने के बावजूद मदद तेज रफ्तार से नहीं पहुंच पा रही थी। प्रशासन की
तकलीफ ये थी कि बाढ़ का असर इतना बड़ा था कि सब तक पहुंचना संभव नहीं था।
हेलिकॉप्टर से राहत सामग्री गिराई जा रही थी, ये भी पर्याप्त नहीं था।
पैंतालीस लाख की आबादी वाले इस शहर का अस्सी फीसदी हिस्सा बाढ़ से
प्रभावित हुआ था और आर्थिक नुकसान था करीब दस हजार करोड़ रुपये का। ऐसे
में सियासी दांव पेंच की शुरूआत भी हो गई थी। कांग्रेस राज्य सरकार पर
सूरत को बाढ़ में झोंकने का आरोप लगा रही थी, तो गुजरात में सत्तारूढ़
बीजेपी केंद्र की यूपीए सरकार पर पर्याप्त मदद नहीं देने का। लोगों की
बात सुनते-सुनते एक और रात बीत गई। इस दौरान हमारे दो और सहयोगी मुंबई से
मयूर परीख और भोपाल से ब्रजेश राजपूत अपनी कैमरा टीम लेकर पहुंच चुके थे।
ऐसे में उनके रहने की व्यवस्था भी उसी होटल में कर एक और रात बिना
बिजली-पानी के गुजारी।

११. ०८.२००६
सूरत की बाढ़ की लगातार पांचवे दिन की कवरेज के लिए एक बार
फिर से सुबह के पांच बजे उठा। अपने दो सहयोगियों को सूरत के आर्थिक
नुकसान का आकलन और लोगों की समस्या जानने के लिए दूसरे इलाकों में भेजा
और खुद कतारगाम इलाके की तरफ निकला। लेकिन वहां पहुंचने के पहले ही मेरी
निगाह पड़ी सड़क के किनारे नजर आ रही एक अंतहीन सी लाइन पर। गाड़ी रोकी
तो पता चला कि बाढ़ का पानी निकलने के बाद लोग दूध जैसे जरूरी वस्तु की
खरीद के लिए निकले हैं और उसके लिए लगी है इतनी बड़ी लाइन।

पैदल चलते,लोगों से बात करते करीब दो किलोमीटर दूर सुमूल डेयरी के मुख्य द्वार पर
पहुंचा, तो नजारा ऐसा मानो दंगा होने की तैयारी हो। लोग एक – दूसरे पर
गिरे जा रहे थे दूध की थैलियां हासिल करने के लिए। ऐसे में पुलिस को
हस्तक्षेप करना पड़ा। महिलाओं के लिए अलग लाइन बनी। भीड़ इतनी कि एक-एक
आदमी को दूध का एक पैकेट हासिल करने के लिए करना पड़ा कई घंटों का
इंतजार।

वहां से आगे बढ़ा तो स्वास्थ्य विभाग और सेना के मेडिकल कोर की टीम दिखी।
जिन इलाकों से पानी निकलना शुरू हुआ था, वहां महामारी की आशंका को टालने
के लिए जरूरी था दवाओं का वितरण। बड़े पैमाने पर लोग बीमार भी हो गये थे,
घरों में तीन-तीन दिन तक बंद होने के कारण। कई जगह पर कीचड़ की चार-चार
फीट उंची लेयर जम गई थी। इनको साफ करना नगर निगम के लिए हरक्यूलियन टास्क
था।

दोपहर बाद होटल पर वापस लौटा, तो देखा भारी-भरकम भीड़ लगी हुई है। दरअसल
हमारे ही होटल पर ज्यादातर टेलीविजन संवाददाता ठहरे हुए थे, साथ में थीं
उनकी ओबी वैन, जिससे वो लाइव प्रसारण कर रहे थे। पता चला कि दस बजे के
करीब टीवी के साथी पत्रकारों ने लोगों से उनकी समस्याओं को सुनना शुरू
किया था और ऐसे में अपनी पीड़ा और भड़ास निकालने वालों की तादाद इतनी बढ़
गई कि हालात नियंत्रण के बाहर चले गये। एक की सुनें, तो दूसरा हल्ले पर
उतारू। लोगों ने ऐसा हुल्लड़ मचाया कि सभी पत्रकारों को अपने कैमरे वगैरह
लेकर भागने पड़े होटल के अंदर। ऐसे में हुड़दंगियों ने ओवी वैन पर पत्थर
मारना शुरू कर दिया। कुछ ने तो होटल के अंदर भी घुसने की कोशिश की। संयोग
से उसी वक्त पुलिस की एक मोबाइल वैन बगल से गुजर रही थी, पुलिस के जवानों
ने तत्काल मोर्चा संभाला और हुड़दंगियों को भगाया। पुलिस की एक टुकड़ी भी
होटल के बाहर तैनात करनी पड़ी। बाद में पता चला कि अपनी समस्या बताने के
नाम पर कई लोगों ने अपने को टीवी पर दिखाने की तरकीब अख्तियार कर ली थी।
इसी में एक लड़ाकू महिला भी थी, जो नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और यहां
तक कि मीडिया पर भी अपना गला फाड़ रही थी। पता चला कि वो कोई सामाजिक
कार्यकर्ता नहीं, बल्कि रेलवे स्टेशन के आसपास धंधा करने वाली एक वेश्या
है, जो बाढ़ में धंधे पर मार पडने की वजह से टीवी कैमरों के आगे अपने को
बाढ़ग्रस्त ठहराने में लगी थी।

हुड़दंगियों के उपद्रव की वजह से सभी साथी पत्रकारों का मूड खराब हो गया।
सूरत की जनता की समस्याओं को देश और सरकार के सामने रखने की कोशिश पिछले
चार दिनों से सभी पत्रकार कर रहे थे, वैसे में कुछ शरारती लोगों के कारण
पत्रकारों को अपनी जान बचाकर होटल के अंदर भागना पड़ा। खैर, पत्रकारिता
में ये सब सहना पड़ता है, यही मानकर हम लोगों ने इस बार होटल की बाल्कनी
से लाइव चैट का सिलसिला शुरू किया। यही करते-करते शाम होने लगी थी, तब तक
एक और बुरी खबर आई। पता चला कि गुजरात के एक और जिले पंचमहाल में बाढ़ का
खतरा पैदा हो गया है, क्योंकि कडाना बांध के कैचमेंट एरिया में भारी
बारिश हुई थी और इसकी वजह से मही नदी में छूट रहा था भयावह रफ्तार से
पानी। इसकी वजह से नजदीक के सैकड़ों गांवों में बाढ़ का पानी घुसने की
आशंका पैदा हो गई थी। ऐसे में मैंने शाम के वक्त सूरत से निकलने का फैसला
कर लिया, क्योंकि सूरत में एक तो बाढ़ का पानी कम हो रहा था, दूसरा ये कि
बाकी सहयोगी भी यहां पहुंच गये थे। लेकिन जाते समय मैंने होटल के कमरे से
प्रबंधन की तरफ से भेजा गया वो नोट रख लिया, जिसमें बाढ़ की आपदा के कारण
पैदा हुए असाधारण हालात में ग्राहकों को हुई असुविधा के लिए खेद प्रकट
किया गया था। वो कागज अब भी मैंने संभाल कर रखा है अपने बच्चों को दिखाने
के लिए, तब तक के लिए जब वो बाढ़ और इसकी भयावहता को समझने के काबिल हो
जाएंगे। पाठ्यपुस्तक में मैंने पटना की बाढ़ पढ़ी थी, शायद मैं अपने
बच्चों को सूरत की बाढ़ के बारे में ढंग से बता सकूं।

1 comment:

KETAN JOSHI said...

Sir, aapke 'surat me aai badh ke vo panch din' padhkar mano ham bhi badh ka anubhav kar rahe ho....good aproch..